Tuesday, February 19, 2019
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दिल की दुर्लभ बीमारी से पीड़ित 4 महीने के बच्चे को जेपी हाॅस्पिटल में मिला नया जीवन

संवाददाता (नोएडा) नोएडा के मल्टी सुपर स्पेशलटी अस्पताल, जेपी हाॅस्पिटल के पीडिएट्रिक कार्डियोलोजी विभाग के डाॅक्टरों की टीम ने पाकिस्तान के लाहौर से आए चार महीने के बच्चे रोहन को नई जिंदगी दी है। रोहन दिल की घातक बीमारी ‘हाइपोप्लास्टिक लेफ्ट हार्ट सिंड्रोम से पीड़ित था। रोहन के माता-पिता को बच्चे के इलाज के लिए भारतीय मेडिकल वीज़ा नहीं मिल पा रहा था। तभी रोहन के पिता ने ट्विटर के ज़रिए माननीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से अपील की। सुषमा जी ने बेबी रोहन के लिए तुरंत मेडिकल वीज़ा लगवाया और परिवार 24 घण्टे के अंदर इलाज के लिए भारत पहुंच गया। 7 सितम्बर 2017 को रोहन को जेपी हाॅस्पिटल लाया गया, जहां पीडिएट्रिक कार्डियोलोजी विभाग के डायरेक्टर डाॅ. राजेश शर्मा की टीम ने 8 सितम्बर 2017 को बच्चे की सर्जरी की। बेबी रोहन अब ठीक हो रहा है और छुट्टी के एक महीने बाद जनवरी के पहले सप्ताह में पाकिस्तान लौट जाएगा।
मरीज़ की बीमारी के बारे में बताते हुए जेपी हाॅस्पिटल में पीडिएट्रिक कार्डियोलोजी विभाग के डायरेक्टर डाॅ राजेश शर्मा ने कहा, ‘‘रोहन एक दुर्लभ जन्मजात दिल की बीमारी से पीड़ित था। जब वह सिर्फ पांच दिन का था तभी उसमें ‘हाइपोप्लास्टिक लेफ्ट हार्ट सिंड्रोम का निदान किया गया। यह दिल की ऐसी बीमारी है जिसमें गर्भ के विकास के दौरान बच्चे के दिल में रक्त का सामान्य प्रवाह नहीं हो पाता। रोहन का जीवन खतरे में था क्योंकि उसके दिल का बायां हिस्सा विकसित नहीं हुआ था। जिसके चलते उसके फेफड़ों पर भी दबाव बन रहा था। शुरूआत से ही उसे सांस लेने में दिक्कत आ रही थी और उसका वज़न भी नहीं बढ़ रहा था।’’
डाॅ. राजेश शर्मा ने कहा, ‘‘रोहन को जब जेपी हाॅस्पिटल लाया गया, तब उसका वज़न सिर्फ 2.1 किलो था, ऐसे में उसका इलाज अपने आप में बेहद चुनौतीपूर्ण था। हमने ‘माॅडीफाईड नाॅरवुड प्रक्रिया’ से उसका इलाज किया, जो दिल की मुश्किल सर्जरी है। पूरे एशिया में इस तरह की सर्जरी कुछ ही अस्पतालों में की जाती है। नाॅरवुड प्रक्रिया तीन स्टैप्स में की जाने वाली सर्जरी है जिसमें मरीज़ में नया फंक्शनल सिस्टमेटिक सर्किट बनाया जाता है जिससे शरीर के अंगों तक आॅक्सीजन युक्त रक्त का प्रवाह ठीक से होने लगता है।’’
‘‘सर्जरी में मेन पल्मोनरी आर्टरी और आर्योटा को कनेक्ट किया गया इसके बाद मेन पल्मोनरी आर्टरी को दो ब्रांचिंग पल्मोनरी आर्टरनीज़ से काट कर अलग किया गया जो फेफड़ों तक रक्त ले जाती हैं। दाएं वेन्ट्रिकल को मेन वेन्ट्रिकल में बदला गया जो दोनों फेफड़ों में रक्त को पम्प कर सके और सानो शंट के द्वारा कनेक्शन बनाया गया। सर्जरी में तकरीबन 10 घण्टे लगे। सर्जरी के बाद बच्चे को आईसीयू में रखा गया जहां उस पर पूरी निगरानी रखी गई। आईसीयू में लाने के कुछ ही घण्टे बाद हमने पाया कि दिल धीमी गति से काम कर रहा है, उसका रक्तचाप भी कम हो गया। हमने तुरंत उसे कार्डियोपल्मोनरी रिसासिटेशन-सीपीआर दिया। सीपीआर के बाद बच्चे की स्थिति बेहतर हो गई, लेकिन वह पूरी तरह से स्थिर नहीं था। इसके लिए हमने एक्स्ट्राकोरपोरियल मेम्ब्रेन आॅक्सीजिनेशन तकनीक ;म्ब्डव्द्ध का इस्तेमाल किया और मरीज़ को कार्डियक एवं रेस्पीरेटरी सपोर्ट पर रखा क्योंकि उसका दिल और फेफड़े ठीक से काम नहीं कर रहे थे। पांच दिनों के बाद 2 डी म्ब्भ्व् एनालिसिस में पाया गया कि उसका दिल बेहतर काम कर रहा था, जिसके बाद उसे म्ब्डव् से हटा लिया गया।’’

डाॅ राजेश शर्मा ने कहा, ‘‘सर्जरी के बाद संक्रमण की संभावना को देखते हुए हमें उसे प्टप्ळ और एंटी-माइक्रोबियल दवाओं पर रखना था ताकि उसके शरीर की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाई जा सके। कुछ समय के लिए उसे आर्टीफिशियन न्यूट्रिशन दिया गया।’’
बच्चे को धीरे धीरे वेंटीलेशन से हटाया गया, लेकिन वेंटीलेटर सपोर्ट हटाने से उसे सांस लेने में परेशानी होने लगी। (ट्रेकियो ब्रोंकोमलेसिया के कारण- एक ऐसी स्थिति जिसमें सांस की नली में कार्टिलेज संरचनाएं बेहद कमज़ोर हो जाती हैं)। इसके लिए टेªकियोस्टोमी की गई, जिसे सर्जरी के 15 दिन बाद हटा लिया गया और रोहन को सामान्य वार्ड में भेज दिया गया।
डाॅ राजेश शर्मा ने कहा, ‘‘1000 में से एक बच्चा इस तरह की दिल की बीमारी से पीड़ित होता है। ऐसे मामलों में सलाह दी जाती है कि जल्द से जल्द बच्चे को सही इलाज मिले। रोहन सिर्फ एक महीने का था जब हमने उसकी सर्जरी की। लेकिन सर्जरी में 5 से 10 फीसदी जोखिम था। हालांकि सीमापार बैठे लोगों की प्रार्थनाओं के चलते सर्जरी कामयाब रही और बच्चे को नया जीवन मिला।’’
‘‘हमारा बच्चा सिर्फ पांच दिनों का था जब हमें इस बीमारी के बारे में पता चला। पाकिस्तान के डाॅक्टरों ने हमें बताया कि एक महीने के अंदर सर्जरी हो जानी चाहिए। सर्जरी बेहद मुश्किल थी और एशिया के दो या तीन अस्पतालों में ही की जाती है, ऐसे में हम बेहद परेशान हो गए। कई दिनों तक इंटरनेट से जानकारी लेने के बाद हमें पता चला कि जेपी हाॅस्पिटल में डाॅ राजेश शर्मा इस तरह की मुश्किल सर्जरी सफलतापूर्वक कर चुके हैं। इसलिए हम रोहन को जल्द से जल्द भारत लाना चाहते थे, लेकिन हमें मेडिकल वीज़ा नहीं मिल रहा था। एक महीने के अंदर सर्जरी करना बेहद ज़रूरी था और हमारे पास बहुत कम समय बचा था। हमने सुश्री सुषमा स्वराज से बात करने का फैसला लिया। हम उनके प्रति आभारी हैं जिन्होंने हमारे इस आग्रह पर ध्यान दिया और एक दिन के अंदर हमें वीज़ा मिल गया। हम जेपी हाॅस्पिटल के डाॅक्टरों के प्रति भी आभारी हैं जिन्होंने हमारे बच्चे को नया जीवन दिया है।’’ बेबी रोहन की मां मेहविश मुख्तार (28) ने कहा।

 

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