Tuesday, February 19, 2019
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आंकड़ों की बाजीग़री से रोजगार सृजन

विश्वजीत राहा (स्वतंत्र टिप्पणीकार)
अपने चुनावी वादों को जुमला बनने से रोकने के लिए केन्द्र की मोदी सरकार एक नया तरीका अपनाने का निर्णय लेने के करीब है। दरअसल भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रतिवर्ष 1 करोड़ युवाओं को नौकरी देने का ऐलान किया था। लेकिन अपने कार्यकाल के चार वर्ष बीत जाने के बावजूद सरकार अपनी घोषणा का एक चैथाई भी रोजगार देने में सफल नहीं हो पाई है जिसकी अब खूब आलोचना हो रही है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की सबसे अधिक आलोचना रोजगार के अवसर पैदा करने के वादे को पूरा न करने को लेकर की जाती है। इन आलोचनाओं से भटकाने के लिए मोदी सरकार ने अब दो उपायों पर काम करना शुरू कर दिया है।
प्रिंट मीडिया के रिपोर्टों के मुताबिक पिछले पांच सालों में सरकार की दिशाहीन नीतियों के कारण केंद्र में करीब चार लाख पद खाली पड़े हैं। मार्च 2016 की स्थिति के अनुसार केंद्र सरकार में असैन्य कर्मचारियों के कुल 36.34 लाख पद स्वीकृत हैं इनमें 5.33 लाख ग्रुप सी स्तर के, 51 हजार गु्रप बी स्तर के और करीबन 18 हजार ग्रुप ए स्तर के पद खाली हैं। सरकार अब ऐसे लाखों पदों को समाप्त करने पर विचार कर रही है जो पांच सालों से रिक्त हैं। दरअसल इसी साल 16 जनवरी को मोदी सरकार ने सभी मंत्रालयों तथा विभागों को खाली पदों से संबंधित व्यापक रिपोर्ट सौंपने को कहा है। वित्त मंत्रालय ने एक कार्यालय ज्ञापन के द्वारा सभी मंत्रालयों तथा विभागों से पांच साल से खाली पड़े पदों को समाप्त करने के लिये कार्रवाई रिपोर्ट देने को कहा गया है। संसद में भी केंद्र सरकार की तरफ से बताया गया था कि केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में चार लाख से ज्यादा पद खाली हैं। ऐसे में सरकार इन खाली पदों को ही समाप्त करने का निर्णय लेने वाली है। अगर ऐसा होता है तो मोदी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा सकेगा कि मोदी सरकार के कार्यकाल में रिक्त पदों की संख्या घटी है यानि रोजगार सृजन का प्रतिशत बढ़ा है।
इतना ही नहीं प्रतिवर्ष एक करोड़ लोगों को नौकरी देने के वादे पर चैतरफा वार झेल रही केंद्र की नरेंद्र मोदी आलोचनाओं से बचने का रास्ता भी लगभग तैयार कर लिया है। दरअसल सरकार अब उन लोगों के आंकड़ा को भी रोजगार पाने वालों की सूची में शामिल करने पर विचार कर रही है जो स्वरोजगार कर रहे हैं। अगर ऐसा होता है तो पिछले चार साल में रोजगार पाने वालों की संख्या में अप्रत्याशित इजाफा हो सकता है। इसके तहत केंद्रीय श्रम मंत्रालय द्वारा प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के जरिए ऋण लेकर स्वरोजगार करने वालों का आंकड़ा जोड़ने पर विचार किया जा रहा है। गौरतलब है कि वर्तमान में अनुमानित तौर पर देश का कुल वर्कफोर्स 50 करोड़ है। इसका मात्र 10 फीसदी हिस्सा ही संगठित क्षेत्र से आता है। शेष बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र से आता है, जहां ना तो उचित पारिश्रमिक दिया जाता है और ना ही कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा का ख्याल रखा जाता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि रोजगार से संबंधित आंकड़े जारी करने वाला श्रम ब्यूरो केन्द्र सरकार के श्रम मंत्रालय के अधीन काम करता है। अब 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले मोदी सरकार श्रम ब्यूरो के इन्हीं आंकड़ों को लोगों के सामने रखकर अपनी पीठ थपथपा सकती है।
दरअसल, यह प्रस्ताव तब आया जब एक रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया कि पिछले साल करीब 70 लाख लोगों ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन में रजिस्ट्रेशन कराया है। यानि मोदी सरकार के कार्यकाल में एक साल में 70 लाख लोगों को रोजगार तो मिला ही है। ईपीएफओ में इतनी संख्या को जोड़ने का अर्थ सरकारी एजेंसियां इतने रोजगार के अवसर सृजित होने से लगा रहीं हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि ईपीएफओ में नामांकन का मतलब नौकरी नहीं होता है। श्रम ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 में कुल 4 लाख 16 हजार लोगों के लिए रोजगार सृजन हुआ है। इनमें से 77 हजार पहली तिमाही में, 32 हजार दूसरी तिमाही में, 1 लाख 22 हजार तीसरी तिमाही में और 1 लाख 85 हजार चैथी तिमाही में रोजगार सृजन हुआ है, इसमें स्वरोजगार करने वालों की संख्या शामिल नहीं है। मंत्रालय प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के जरिए स्वरोजगार पाने वालों को देश में पहली बार जॉब डेटा में शामिल किया जाएगा। अगर ऐसा होता है तो नौकरीशुदा लोगों की मौजूदा संख्या में पांच करोड़ का इजाफा हो सकता है। यानी पांच साल में पांच करोड़ का रोजगार सृजन, जैसा कि भाजपा ने चुनाव पूर्व वादा किया था।
बहरहाल कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि पकौड़े की दुकान खोलना भी तो रोजगार है जिसका समर्थन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य सभा में अपने वक्तव्य से कर दिया। जबकि भाजपा ने सरकार आने पर बेरोजगारों को योग्यता के आधार पर रोजगार देने का वादा किया था। तो सवाल बहुतेरे हैं। मसलन नये रोजगार के अवसर सृजित न कर पुराने सृजित पदों को समाप्त करने से क्या नौकरी का टोटा नहीं पड़ेगा? क्या केन्द्र सरकार की यह नीति तर्कसंगत व न्यायसंगत मानी जा सकती है? क्या स्वरोजगार के तहत रोजगार पाये युवाओं को सरकारी नौकरी प्राप्त युवाओं के बराबर रखकर आकलन करना सही है? और सबसे अहम सवाल सरकार की आंकड़ों की इस बाजीगरी को युवा वर्ग किस नजरिये से देखेगी? और सवाल यह भी कि क्या देश की युवाओं को रोजगार से इतर हिन्दू-मुस्लिम, सवर्ण-दलित आदि के नाम बरगलाया जाता रहेगा? बहरहाल इन सवालों के जवाब तो 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से स्पष्ट हो पायेगा। कुल मिलाकर जब सरकार अपने वादे को पूरा करने में लगभग असफल रही तो रोजगार के नाम पर रिक्त पदों को समाप्त कर व रोजगार के आंकड़ों में स्वरोजगार को शामिल कर युवा सपनों के पंख को कतरने का प्रयास करने में जुट गई है।

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