Tuesday, February 19, 2019
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स्वराज अभियान के जय किसान आंदोलन ने शुरू किया राष्ट्रव्यापी MSP सत्याग्रह

संवाददाता (दिल्ली) स्वराज अभियान के जय किसान आंदोलन ने राष्ट्रव्यापी MSP सत्याग्रह शुरू किया |स्वराज अभियान के जय किसान आंदोलन, अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के कई संगठन, पीपुल्स मूवमेंट्स (एनएपीएम), रयथु संयुक्त एक्शन कमेटी (तेलंगाना) और किसान संघर्ष समिति, मध्य प्रदेश साथ मिलकर सरकार को MSP की चुनौती को स्वीकार करता है। यह “एमएसपी सत्याग्रह” 14 मार्च 2018 को कर्नाटक के यादगीर से शुरू किया जा रहा है। इस सत्याग्रह में दो उद्देश्यों को लेकर मंडी-मंडी की यात्रा करना और जगह-जगह किसान दरबार लगाना शामिल होगा :

1. किसानों की लूट को लेकर उन्हें सचेत करना और उचित एमएसपी के कानूनी अधिकारों की मांग को आगे बढ़ाना।
2. यह देखना कि क्या सरकार के वादे/आश्वासन के मुताबिक किसानों को एमएसपी मिल रहा है। इस एमएसपी सत्याग्रह के चरण 1 के अंतर्गत 14 मार्च – यादगीर (कर्नाटक),15 मार्च – कुरनूल (आंध्र),16 मार्च – तंदूर (तेलंगाना),17 से 18 मार्च – श्री गंगानगर (राजस्थान),19 मार्च – रेवारी (हरियाणा),25 मार्च – रुद्रपुर (उत्तराखंड) ये क्षेत्रों से शुरुआत होगी |
योगेंद्र यादव ने कहा की एमएसपी सत्याग्रह गांधीवादी सत्याग्रह की वास्तविक भावना को आधार बनाकर तैयार किया गया है। हम सच की खोज के लिए एक मिशन पर हैं। एमएसपी की सच्चाई के इस सामूहिक खोज में भाग लेने के लिए हम सरकारी अधिकारियों, कार्यकर्ताओं, कृषि विशेषज्ञों और मीडिया को आमंत्रित करते हैं।
मौजूदा सिस्टम में किसानों को उचित और लाभकारी आमदनी सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) एक प्रभावी औज़ार है। केंद्र सरकार द्वारा तय किया गया एमएसपी किसानों को न्यूनतम मूल्य देने की निश्चित गारंटी देता है जो किसान को मंडियों में अनाज के दाम नहीं मिलने पर न्यूनतम दाम देने की गारंटी देता है।

2018 के बजट भाषण में वित्त मंत्री ने विशेष जोर देकर किसानों को एमएसपी पर बिक्री सुनिश्चित करने की केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता जाहिर की थी। घोषणा करते हुए श्री जेटली ने कहा कि उनकी सरकार ने अपने चुनावी वादे के मुताबिक़ रबी के अधिकांश फसलों के लिए पहले ही MSP लागू कर दिया है, जो लागत कीमतों पर कम-से-कम 50% रिटर्न पर आधारित है। रबी और खरीफ़ के शेष फसलों के लिए भी घोषणा का आश्वासन दिया गया। हालांकि किसान संगठनों ने पहले ही इसे अधूरा बताकर MSP के दावे को उजागर कर दिया है। बाद में श्री जेटली ने भी स्वीकार किया कि वह जिस लागत की बात कर रहे हैं वह सी 2 यानि (Comprehensive C 2) लागत नहीं बल्कि आंशिक लागत ए2+एफएल (A2+FL) पर आधारित है।
वित्त मंत्री और बाद में प्रधान मंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि मौजूदा एमएसपी पर्याप्त नहीं है, तथा किसानों को घोषित एमएसपी का पूरा लाभ मिलना चाहिए। किसानों को एमएसपी दिलाने के लिए इस साल सरकार सभी प्रकार के कदम उठा रही है। वित्त मंत्री ने यह भी वादा किया कि यदि बाजार में कृषि उत्पाद की कीमत एमएसपी से कम है, तो सरकार स्वयं एमएसपी पर खरीद करेगी या किसी अन्य तंत्र के जरिये किसानों को एमएसपी का दाम दिलाएगी। नीति आयोग, केंद्र और राज्य सरकारों के परामर्श से एक प्रभावी मैकेनिज्म बनायेगा ताकि किसानों को उनके उत्पादन के लिए पर्याप्त मूल्य मिले।

रबी फसल 2018-19 की बिक्री शुरू होने के साथ ही इस वादे की परीक्षा भी शुरू होती है। खरीफ फसल 2017-18 की बिक्री का विश्लेषण दर्शाता था कि किसान अपनी फसल एमएसपी से नीचे बेचने को मजबूर थे। जिससे किसानों को कम से कम 32,702 करोड़ रुपये का कुल नुकसान हुआ था।

इस बार भी अब तक संकेत बहुत अच्छे नहीं हैं। इस बिक्री सीजन के पहले कुछ हफ्तों में बंगाल में चने की कीमत 4,400 रुपये के एमएसपी (4250+150 रु बोनस) के मुकाबले काफी हद तक नीचे गिर गई हैं। मार्च के पहले हफ्ते के एग्रीमार्केट के आंकड़ों से पता चलता है कि चना की औसत मॉडल कीमत MSP से नीचे 800 से 1000 रुपये है जो पिछले साल की कीमतों के मुकाबले काफी कम है। अफसोस की बात है कि किसानों को इस नुकसान से बचाया जा सकता था। क्योंकि सरकर को चने की बुआई और अच्छे पैदावार की जानकारी होने के बावजूद सरकार ने चने के थोक आयात की अनुमति दी। अप्रैल-नवंबर 2016 में 2.49 लाख टन के मुकाबले 2017 में इसी दौरान आयात 7.47 लाख किया गया। महाराष्ट्र सरकार ने 19 लाख टन चने की अनुमानित उत्पादन के मुकाबले सिर्फ 3 लाख टन की खरीद की घोषणा की है। मध्य प्रदेश का भवान्तर योजना से भी किसानों को कोई फायदा नहीं हो रहा है। निति आयोग किसानों की आय बढ़ाने को लेकर क्या उपाय कर रहा है, अब तक किसी को मालूम नहीं।इस सीजन के पहले तीन सप्ताह में चना के 90 टन के अनुमानित आगमन और मॉडल मूल्य के मूल्यांकन के आधार पर केवल चने की फसल में किसानों को 6087 रुपए के नुकसान की संभावना है। अभी तक हुए नुकसान का पिछले वर्ष की तुलना में दर्शाता हुआ चार्ट संलग्न है।

इसी प्रकार अन्य फसलों के कीमत कम होना भी चिंता की बात है। जैसे मसूर 4,250 के एमएसपी के मुकाबले 3,200 से 3,800 पर बिक रहा है। क्या यही रुझान बाकी फसलों के लिए भी बना रहेगा? सरकार के किसानों को दाम दिए जाने के वादे और वास्तव में किसानों को मिल रहा दाम में बड़ा फासला है। इस हकीकत का पता लगाने के लिए मंडी-मंडी का दौरा जरुरी है।

 

 

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