Monday, November 19, 2018
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बूढ़ा शेर क्यों दहाड़े

अमर सिंह बिष्ट, संस्थापक ट्रस्टी (शंकल्प शक्ति फाउंडेशन संस्था )
इस कलम के माध्यम से मैँ अमर सिंह बिष्ट, शंकल्प शक्ति फाउंडेशन संस्था का संस्थापक ट्रस्टी जो समाज के सम्मानित बुजुर्ग वर्गों के कल्याण व् अधिकार के लिए निरंतर अपनी टीम के साथ लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल, पूर्वी जिला में काम कर रही हैं लेख के माध्यम से आज मैं अपने पाठकों का ध्यान अपने विषय “बूढ़ा शेर क्यों दहाड़े” कि तरफ़ आकर्षित करना चाहूंगा।
बूढ़ा शेर क्यों दहाड़े से तात्पर्य यह है कि आज हमारे समाज में हमारे बुजुर्ग वर्ग एक प्रकार की असुरक्षा की भावना से ग्रस्त हैं और यह भावना उनके मन और मस्तिकष में धीरे-धीरे घर कर रही हैं, जो की उनके स्वास्थ्य के लिए नकारात्मक है।
पहले के दशक में लोग सयुंक्त परिवार में रहना पसंद करते थे जहाँ बुजुर्ग उस परिवार की नींव माना जाता था, उसे मुखिया का दर्जा प्राप्त था। घर परिवार के सारे छोटे बड़े फैसले लेने का अधिकार उसके पास था। आपने परिवार को सामाजिक और आर्थिक स्तर पर आगे कैसे बड़ाना है हमारे बुजुर्ग बहुत अच्छे से जानते थे और वह वर्ग बहुत कुशल था।
परिवार को कैसे खुश रखना है, परिवार की परेशानियों का हल कैसे निकालना है। दुसरो की सहायता का भाव, समाज के प्रति सकारात्मक व्यवहार आदि यह उनकी कार्यशैली हुआ करती थी, जिसमे बुजुर्ग वर्ग आपने अत्यधिक अनुभव के होते हुए इन सबमें निपुण थे।
21 शताब्दी के आगमन से इस्थितिया विपरीत हो चुकी हैं। आज हमारा समाज और हमारे समाज के लोग सामाजिक और आर्थिक स्तर में बट चुके है। आज लोग धर्म व् जात -पात के नाम पर एक दूसरे से कटते है। परिवारों का विभाजन हो रहा है और परिवारों के साथ-साथ हमारे समाज में माता-पिता का भी विभाजन हो रहा है। स्थिति यह है कि आज माता- पिता अपने बच्चो से अलग रह रहे है या बुजुर्ग दंपति अलग-अलग बच्चों के साथ रह रहे हैं जो उनकी मजबूरी है। आज हमारा बुजुर्ग वर्ग अपने बच्चों के प्यार के लिए तरस रहा है। समाज से सम्मान के लिए लड़ रहा है।
हमारे बुजुर्गों का अस्तित्व परिवार में कही खो गया है, बुजुर्ग उसे ढूंढ रहा है। अस्तित्व व् सम्मान को पाने के लिए कभी -कभी वही बुजुर्ग अपनों से सहायता की आशा करता हैं तो उसको निराशा ही हाथ आती है, इसलिए वह असहाय महसूस कर रहा हैं। अकेलेपन की भावना से ग्रस्त बुजुर्ग या तो कुछ सालो बाद इस दुनिया से विदाई ले लेते है या विर्द्धाश्रम में अपना जीवन अपने हमउम्र लोगो के साथ व्यतीत करते है।
आपने शब्दो को विराम देते हुए बस इतना कहना चाहुँगा कि एक कहावत हैं- जैसा बोओगे, वैसा पाओगे।

आशीर्वाद:-
कुछ पल बिता कर बुजुर्गो के साथ,
मैंने जिंदगी का नया तजुर्बा ले लिया।
कुछ देर उनके पैर दबा कर,
मैंने करोड़ों का आशीर्वाद ले लिया।
– हिमानी नैलवाल (लेखक)

 

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