Thursday, December 13, 2018
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बेमतलब का अविश्वास प्रस्ताव

विश्वजीत राहा (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

…तो वर्तमान मोदी सरकार के निर्धारित मियाद के आखिरी दौर में सरकार के खिलाफ विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर बहस और मतदान शुक्रवार को होना तय हो गया। मौजूदा मानसून सत्र के पहले ही दिन कांग्रेस, टीडीपी सहित 50 से भी ज्यादा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के सामने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जिसे लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने सत्र के पहले ही दिन विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। गौरतलब है कि इससे पहले भी बजट सत्र के दौरान आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न देने से नाराज टीडीपी ने अविश्वास प्रस्ताव लाया था जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने ठुकरा दिया था। पिछले 15 साल में यह तीसरा अविश्वास प्रस्ताव है। इससे पहले 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के खिलाफ प्रस्ताव आया था जिसमें सरकार की जीत हुई थी। इसके बाद साल 2008 में मनमोहन सिंह सरकार न्यूक्लियर डील पर विश्वास प्रस्ताव लाई थी जिसे लोकसभा ने बहुमत से खारिज कर दिया था।
जैसे ही विपक्ष के द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया गया उस पर बहस तेज हो गई। और इसके साथ ही कई सवाल भी उभर कर आये। मसलन संसद में संख्याबल के आधार पर किसका पलड़ा भारी है? और यदि सरकार के पास पर्याप्त संख्याबल है तो ऐसे अविश्वास प्रस्ताव का मकसद क्या है? वैसे तो संख्याबल के आधार पर देखें तो सरकार गिरती हुई दिखाई नहीं देती है। लेकिन कांग्रेस की सोनिया गांधी ने पत्रकारों से ही पूछ लिया कि कि किसने कहा कि उनके पास नंबर नहीं हैं? लेकिन वहीं विपक्ष के एक धड़े के द्वारा यह इशारा किया जा रहा है कि विपक्ष सिर्फ अलग-अलग मुद्दों पर सरकार के खिलाफ अपनी बात देश के सामने रखने के लिए यह प्रस्ताव लाया है। जैसे टीडीपी आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य के दर्जे की मांग कर रही है। वहीं कांग्रेस किसानों की दुर्दशा और अन्य नाकामियों को लेकर सरकार का असली चेहरा जनता के सामने रखना चाहती है तो कई पार्टियां माॅब लिंचिंग को सुप्रीम कोर्ट के ताजे आदेश को मोदी सरकार के खिलाफ हथियार के तरह इस्तेमाल करने की फिराक में है। कुल मिलाकर विपक्ष का यह अविश्वास प्रस्ताव सरकार को अस्थिर करने के लिए बल्कि सरकार की नाकामियों को जनता के सामने लाने का एक साधन मात्र है।
दूसरी ओर बीजेपी को लगता है कि विपक्ष ने उसके अनुकूल मौके पर अविश्वास प्रस्ताव लाया है। इस प्रस्ताव के बहाने उसके लिए सरकार का रिपोर्ट कार्ड संसद के माध्यम से देश के सामने रखने का यह एक बेहतरीन मौका है। इसलिए पिछले बजट सत्र की गलतियों को न दोहराते हुए सरकार पहले ही दिन मान गई। माना जा रहा है कि भाजपा की इस स्वीकृति के पीछे कुछ खास वजहें हैं। इसमें सबसे बड़ी वजह भाजपा का चुनावी मोड में होना है। ऐसे में अविश्वास प्रस्ताव के बहाने विपक्षी एकता की हवा निकालने और जनता के सामने सरकार की कामयाबियां गिनाने के मौका भाजपा गंवाना नहीं चाहती। इसके साथ ही भाजपा फिर यह साबित करने का भी प्रयास करेगी कि केवल भाजपा सहित एनडीए ही देश को सबका साथ सबका विकास के द्वारा तरक्की की राह पर ले जा सकती है।
रही बात संख्याबल की तो बीजेपी इसे लेकर पूरी तरह आश्वस्त दिख रही है। हो भी क्यों न? 545 सदस्यों वाली लोकसभा में फिलहाल 10 सीटें खाली हैं यानि कुल सदस्यों की संख्या 535 है। इस हिसाब से बहुमत का आंकड़ा 268 का होता है। स्पीकर को छोड़कर भाजपा के अपने कुल 273 सदस्य है जो बहुुमत के पार है। और इसमें सहयोगी दलों के सांसदों को जोड़ दिया जाय तो यह संख्या बढ़कर 314 हो जाती है। दूसरी ओर विपक्षी के संख्याबल सिर्फ 221 ही है जिसमें यूपीए के पास 63 सांसद अन्य के पास 157 सदस्य हैं। इनमें एआईएडीएमके और टीआरएस जैसे पार्टियों का मतदान के समय गैरहाजिर रहने की भी संभावना है। और यदि ऐसा होता है तो ऐसे में बहुमत का आंकड़ा 244 ही रह जाएगा, जिससे कहीं ज्यादा संख्या अकेले भाजपा के पास ही है।
हालांकि विपक्ष को भरोसा है कि भाजपा के कई सांसदों के आगामी चुनाव में टिकट कटने की खबरों के कारण कई भाजपा सांसद व्हिप के बावजूद या तो गैरहाजिर या फिर प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाल कर बीजेपी को झटका दे सकते हैं। इनमें शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आजाद, सावित्री फुले सरीखे करीबन सात सांसदों का नाम लिया जा रहा है जो पार्टी से नाराज चल रहे हैं। उधर, भाजपा की कोशिश विपक्षी एकता में सेंध लगाने की होगी। वह चाहती है कुछ विपक्षी सांसद उपराष्ट्रपति चुनाव जैसा माहौल बना दें ताकि विपक्षी कुनबा बनने के पहले ही पूरी तरह बिखर जाय।
बहरहाल इन तमाम कयासों के बीच कई सवाल हैं। सवाल यह नहीं कि जब संख्याबल स्पष्ट रूप से भाजपा के साथ है तो इस अविश्वास प्रस्ताव को लाकर विपक्ष क्या हासिल करना चाहता है। सवाल यह भी नहीं कि अंततः इस प्रस्ताव का फायदा किसे मिलेगा-भाजपा व एनडीए को या कांग्रेस सहित पूरे विपक्ष को। असली सवाल तो यह है कि इस अविश्वास प्रस्ताव से देश की जनता को क्या मिलने वाला है? विदित हो कि लोकसभा की एक दिन की बैठक पर 1.5 करोड़ रूपये खर्च होते हैं। इस हिसाब से संसद की एक दिन की एक मिनट की कार्यवाई में जनता की गाढ़ी कमाई का कुल 2.6 लाख रूपये खर्च होते हैं। तो ऐसे में सवाल किया जा सकता है कि जनता की गाढ़ी कमाई पर सरकार और विपक्ष अपनी ढपली अपना राग बजाने को आतुर क्यों है? क्या यह समय और जनता के पैसे की बर्बादी नहीं है? और सबसे बड़ा सवाल क्या संविधान निर्माताओं ने ऐसे किसी उद्देश्य के लिए अविश्वास प्रस्ताव को प्रावधान संविधान में डाला था? अविश्वास प्रस्ताव में सरकार की जीत होने पर विपक्ष निर्बाध रूप से संसद को चलने देगी फिलहाल इसकी गारंटी देने वाला कोई नहीं है।

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