Monday, November 19, 2018
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*सदगुणों को उर में स्थापित करता है गुरु*

चंद्रमणि पाण्डेय                                                  बस्ती( उत्तर प्रदेश )

युं तो आज के आधुनिक समाज में गुरु शब्द किसी के लिए भी प्रयोग किया जाता है किन्तु गुरु तो महज दो हैं लौकिक व भौतिक दोनों गुरु शब्द की सार्थकता पर विचार करें तो गुरु शब्द गु+उर+उ जहां गु मतलब गुण उर मतलब ह्रदय उ मतलब उतारने अर्थात स्थापित करने वाला कबीरदास जी के अनुसार गुरु वह जो ग्यान का प्रकाश भर राग द्वेश कटुता रूपी अंधकार को समाप्त कर दे वेदों के अनुसार गुरु वह जो ब्रम्हा की तरह हमें हमारी संरचना करे विष्णू की तरह हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करे शंकर जी की तरह कुसंस्कारों का दमन करे ऐसे में हमें जन्म देने हमारा लालन पालन करने व गलतियों पर दण्डित कर पुनरावृत्ति पर अंकुश लगाने का काम कोई करता है तो वह मां है कहा भी गया है कि हमारी प्रथम गुरु मां है माता पिता से बडा इस दुनियां में कोई नहीं यही हमारे लिए साक्षात परमात्मा हैं दूसरा भैतिक गुरु जो कि हमें समाजिक जीवन में जीने की कला समाज का परिचय कराते हुए करता है जिसे हम प्राथमिक गुरु कहते हैं जो कि हमें कलम पकड कर दुनियां की सारी भाषाओं का मूल वर्णमाला का ग्यान देने का काम करने के साथ साथ हमें उठने बैठने बोलने सहित पूरी दिनचर्या निर्धारित कर हमें अनुशासित व संस्कारित बनाता है किन्तु आधुनिकता की दौड में जहां हम सच्चे ईश्वर व गुरु के रुप में विद्यमान मां बाप की उपेक्षा कर रहे हैं वहीं जीवन की नींव स्थापित करने वाले प्रथम गुरू का चयन युं ही कर लेते हैं प्राथमिक गुरु हमें संस्कारवान आचारवान बनाने में सक्षम है या नहीं यह देखते ही नहीं ऐसे में हमारे पाल्यों का नीव कमजोर हो रहा है वो शाब्दिक ग्यान तो पा रहे हैं पर सुखमय जीवन जीने की कला नहीं सीख पा रहे हैं आज गुरु का तात्यपर्य उस व्यक्ति से हो गया है जो हमें अर्थ कमाने लायक बनाये यानी शिक्षा का उद्देश्य ग्यानार्जन के बजाय धनार्जन हो गया है जबकि हम भूल जाते हैं कि विद्या से बडा कोई धन नहीं है और विद्या विनय देता है विनय पात्रता देती है पात्रता से धन व धन से सुख मिलता है जबकि संस्कार विहीन शिक्षा धनार्जन तो सिखाती है पर संस्कार के अभाव में हमारे विनयशील न होकर अहंकारी हो रहे है और अहंकारी व्यक्ति कभी सुखी न हो सकता है न किसी को सुख दे सकता है ऐसे लोग अपने गुरूओं का मान भी सिर्फ दिखाने हेतु करते हैं अपने विचार में वो गुरु से बडे होते हैं जबकि संस्कारवान शिष्य सदैव गुरु कृपा का आभारी होता है उनके सम्मान में झुका रहता है जिससे वह गुरु के अनुभव ग्यान को जीवन भर प्राप्त करता रहता है और समस्त सांसारिक सुखों का भोग कर समाज को भी सुखी बनाता है माता पिता का धर्म है कि पाल्यों के प्राथमिक गुरु का चयन सोच समझ कर करें ताकि हमारे दे के भविष्य संस्कारवान व ग्यानवान बनें छात्रों का धर्म है कि अपने माता पिता के साथ साथ प्राथमिक गुरु का सम्मान करते हुए जीवन में सबका विनय पूर्वक सम्मान कर अपने को एक योग्य नागरिक व अनुशासित शिष्य के रुप में स्थापित करें

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