Monday, December 10, 2018
Home > स्वास्थ्य > जेपी हाॅस्पिटल ने एंकाइलोज़िंग स्पाॅडिलाइटिस, सोरिएसिस और सोरिएटिक आथ्राइटिस के बारे में बढ़ाई जागरुकता

जेपी हाॅस्पिटल ने एंकाइलोज़िंग स्पाॅडिलाइटिस, सोरिएसिस और सोरिएटिक आथ्राइटिस के बारे में बढ़ाई जागरुकता

संवाददाता (नोएडा) एंकाइलोज़िंग स्पाॅन्डिलाइटिस, सोरिएसिस एवं सोरिएटिक आथ्राइटिस के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिए नोएडा के सेक्टर 128 स्थित मल्टी सुपर स्पेशलटी हाॅस्पिटल जेपी हाॅस्पिटल ने एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसमें आम जनता को बीमारी के कारण, रोकथाम, जल्दी निदान के महत्व, इलाज, पोषण एवं व्यायाम के महत्व आदि के बारे में शिक्षित किय गया। विशेषज्ञों और डाॅक्टरों ने बताया कि रोकथाम हमेशा इलाज से बेहतर है और रोकथाम के लिए जागरुकता होना सबसे ज़रूरी है।
एंकाइलोज़िंग स्पाॅन्डिलाइटिस एक क्रोनिक इन्फ्लामेटरी डिज़ीज़ है, जो नितंबों, रीढ़ और कूल्हे के जोड़ों को प्रभावित करती है। यह बीमारी आजल 40 साल से कम उम्र के युवाओं में ज़्यादा आम है, गतिहीन जीवनशैली, बैठने के गलत तरके, तनाव, काम का बोझ आदि इसके मुख्य कारण हैं। इन सभी कारणों से अक्सर मरीज़ की हालत बिगड़ती जाती है और दर्द बढ़ता जाता है।
एंकाइलोज़िंग स्पाॅन्डिलाइटिस के बारे में जानकारी देते हुए डाॅ सोनल मेहरा, कन्सलटेन्ट, र्युमेटोलोजी डिपार्टमेन्ट, जेपी हाॅस्पिटल ने कहा, ‘‘वर्तमान में भारत में लगभग 40 लाख लोग एंकालोज़िंग स्पाॅन्डिलाइटिस से पीड़ित हैं। यह बीमारी महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक पाई जाती है, भारत में हर 1000 में से 1 व्यक्ति इस समस्या से पीड़ित है। जीन, संक्रमण और पर्यावरणी कारक एंकालोज़िंग स्पाॅन्डिलाइटिस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके लक्षण हैं- गर्दन से लेकर पीठ के नीचले हिस्से तक बहुत अधिक दर्द और अकड़न। एएस आथ्राइटिस से जुड़ी एक समस्या है, बीमारी बढ़ने पर दर्द इतना बढ़ जाता है कि मरीज़ के लिए हिलना-डुलना और चलना फिरना तक मुश्किल हो जाता है।’’
‘‘आज भी आम लोगों और यहां तक कि चिकित्सा समुदाय में भी रोग के बारे में जागरुकता की कमी है, यही कारण है कि इसका निदान समय पर नहीं हो पाता। बीमारी का निदान होने पर ज़रूरी है कि मरीज़ डाॅक्टर की सलाह ले और र्युमेटोलोजिस्ट की मदद से इलाज करवाए। सक्रिय जीवनशैली, फिज़ियोथेरेपी और नियमित व्यायाम जैसे योगा, जिम, एरोबिक्स और तैराकी आदि से इसमें बहुत फायदा मिलता है।’’ डाॅ मेहरा ने बताया।
कार्यक्रम के दौरन सोरिएसिस और सोरिएटिक आथ्राइटिस के बारे में भी जानकारी दी गई, इन दोनों को एक साथ सोरिएटिक डिज़ीज़ कहा जाता है। यह आॅटोइम्यून स्थिति है और सूजन इन दोनों का आम लक्षण है। ये दोनों समस्याएं तब होती हैं जब शरीर का इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा प्रणाली या बीमारियों से लड़ने की क्षमता) खुद शरीर पर हमला कर देता है। सोरिएटिक डिज़ीज़ से पीड़ित लोगों में अन्य बीमारियों जैसे ओबेसिटी/ मोटापा, दिल की बीमारी, अवसाद आदि की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है।’’
सोरिएसिस के बारे में बात करते हुए डाॅ साक्षी श्रीवास्तव, कन्सलटेन्ट डर्मेटोलोजिस्ट, जेपी हाॅस्पिटल ने कहा, ‘‘भारत में सोरिएसिस के प्रसार की दर 0.44- 2.8 फीसदी है, महिलाओं की तुलना में यह बीमारी पुरुषों में अधिक पाई जाती है। सोरिएसिस ऐसी स्थिति है जिसमें त्वचा की कोशिकाएं तेज़ी से बढ़ने लगती हैं। जिससे त्वचा पर से पपड़ी/ परतें उतरने लगती हैं। त्वचा पर उभरे पैच, त्वचा का सिल्वर या सफेद या लाल होना इसके मुख्य लक्षण हैं। सोरिएसिस एक क्रोनिक बीमारी है जो बार-बार आती जाती रहती है। इलाज के लिए हम इस बात पर ध्यान देते हैं कि त्वचा की कोशिकाएं तेज़ी से न बढ़ने पाएं। माइल्ड सोरिएसिस के लिए स्किन क्रीम और आॅइन्टमेन्ट इस्तेमाल किए जाते हैं। विटामिन डी सोरिएसिस का प्रभावी उपचार हैं। जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव सोरिएसिस में आराम देते हैं जैसे त्वचा को माॅइश्चराइज़ करना, धूम्रपान न करना और तनाव से बचना।’’
सोरिएटिक आथ्राइटिस के बारे में बात करते हुए डाॅ सोनल मेहरा, कन्सलटेन्ट र्युमेटोलोजी डिपार्टमेन्ट, जेपी हाॅस्पिटल ने कहा, ‘‘सोरिएटिक आथ्राइटिस (पीएसए) ऐसी स्थिति है जो सोरिएसिस के साथ होती है। अन्य प्रकार के आथ्राइटिस की तरह सोरिएटिक आथ्राइटिस (पीएसए) के मरीज़ जोड़ों में दर्द, अकड़न और सूजन महसूस करते हैं। इसका असर आमतौर पर अंगुलियों, पैरों की अंगुलियों और पीठ के नीचले हिस्से पर पड़ता है। इन लक्षणों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। एक अनुमान के अनुसार सोरिएसिस के 5-25 फीसदी मरीज़ सोरिएटिक आथ्राइटिस (पीएसए) का शिकार हो जाते हैं। यह एक क्रोनिक बीमारी है जिसके कारण धीरे धीरे जोड़ों के कार्टिलेज और हड्डियों पर असर पड़ने लगता है। इसलिए जहां तक हो सके, जल्द से जल्द इसका इलाज शुरू करना चाहिए ताकि जोड़ों को कम से कम नुकसान पहुंचे। सही इलाज के द्वारा जटिलताओं की संभावना को कम किया जा सकता है और मरीज़ के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सकता है।’’
कार्यक्रम का समापन न्यूट्रिशनिस्ट और फिज़ियोथेरेपिस्ट ने इन्टरैक्टिव सत्र के साथ किया। फिज़ियोथेरेपिस्ट ने लोगों को व्यायाम के तरीके बताए। उन्होंने कहा कि सक्रिय जीवनशैली से न केवल मरीज़ के शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य में भी सुधार आता है। न्यूट्रिशनिस्ट ने स्वस्थ हड्डियों और त्वचा के लिए सेहतमंद आहार के बारे में जानकारी दी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *