Tuesday, April 23, 2019
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सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर-एसएडी

डाॅ मृणमय दास, सीनियर कन्सलटेन्ट, बिहेवियरल साइन्सेज़,जेपी हाॅस्पिटल नोएडा

सीज़नल डिप्रेशन जिसे सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर या ‘विंटर ब्लू’ भी कहा जाता है, यह डिप्रेशन या बाईपोलर डिसऑर्डर का एक प्रकार है, जो साल के एक ही समय में होता है। सर्दियों में सुबह की शुरूआत देर से होती है तथा शाम जल्दी शुरू हो जाती है, ऐसे में व्यक्ति को दिन भर में धूप की रोशनी कम मिलती है। जैसे जैसे दिन की लंबाई कम होती है डिप्रेशन यानि अवसाद के लक्षण बढ़ते चले जाते हैं, बसंत की शुरूआत होने पर दिन की लंबाई और धूप की मात्रा बढने लगती है।

कारण
सिरकाडियन रिदम (जैविक घड़ी) : सर्दियों में धूप की रोशनी कम होना एसएडी का कारण बन सकता है। धूप कम मिलने से शरीर की जैविक घड़ी प्रभावित होती है और व्यक्ति डिप्रेशन के लक्षण महसूस करने लगता है।
शरीर में सिरेटोनिन का स्तरः सिरेटोनिन एक न्यूरोट्रांसमीटर है, शरीर में इसका स्तर कम होने का असर व्यक्ति के मूड पर पड़ता है और व्यक्ति एसएडी का शिकार हो सकता है। विटामिन डी शरीर में सिरेटोनिन के उत्पादन में मुख्य भूमिका निभाता है, विटामिन डी की कमी से शरीर में सिरेटोनिन का स्तर गिरता है। इससे व्यक्ति दिन में कम एनर्जी और सुस्ती महसूस करता है।
मेलेटोनिन का स्तरः मेलेटोनिन ऐसा हाॅर्मोन है जिसका असर हमारीनींद और मूड पर पड़ता है। एएसडी से पीड़ित व्यक्ति में सर्दियों में मेलेटोनिन ज़्यादा बनता है। सर्दियों में अंधेरा जल्दी होता है, इसलिए दिमाग को लगता है कि सोने का समय हो गया है, इसलिए शरीर मेलेटोनिन का उत्पादन जल्दी शुरू हो जाता है। सर्दियों में सुबह के समय भी धूप कम रहती है,इसलिए शरीर में मेलेटोनिन का स्तर ज़्यादा हो जाता है और व्यक्ति दिन में भी सुस्ती महसूस करता है।
हाइपोथेलेमसः धूप हाइपोथेलेमस को उत्तेजित करती है, हाइपोथेलेमस दिमाग का वह हिस्सा है जो नींद, मूड और भूख पर नियन्त्रण रखता है।
जोखिम के कारक

परिवार का इतिहासः जिन लोगों के परिवार में एसएडी या डिप्रेशन से पीड़ित कोई व्यक्ति हो, उनमें इसकी संभावना अधिक होती है।
महिलाओं में एसएडी की संभावना ज़्यादा होती हैः पुरुषों की तुलना में महिलाओं में एसएडी के मामले ज़्यादा पाए जाते हैं। इसके अलावा बुजुर्गों के बजाए युवाओं में इसकी संभावना अधिक होती है।
मेजर डिप्रेशन या बाइपोलर डिसऑर्डरः अगर व्यक्ति को इनमें से काई भी समस्या है तो डिप्रेशन/ अवसाद के लक्षण ज़्यादा गंभीर हो सकते हैं।
इक्वेटर/ यानि भूमध्य रेखा से दूर रहनाः इक्वेटर से दूर उत्तर या दक्षिण दिशा में रहने वाले लोगों में एसएडी की संभावना ज़्यादा होती है। ऐसा सर्दियों में कम धूप तथा गर्मियों में लंबे दिनों के कारण होता है।
लक्षण

एसएडी के लक्षणः

कम एनर्जी महसूस करना
सुस्ती या आलस महसूस करना
एकाग्रता में कमी
सोने में परेशानी
निराशा या अपराधबोध महसूस करना
आपको जो काम कभी अच्छे लगते थे, उनमें रुचि खो देना
भूख या वज़न में बदलाव
लगभग रोज़ाना, दिन के ज़्यादातर समय डिप्रेशन महसूस करना

जटिलताएं

अगर एसएडी का इलाज न किया जाए तो यह कई समस्याओं का कारण बन सकता है जैसेः
स्कूल और काम में समस्याएं
आत्महत्या की सोच या व्यवहार
अपने आप को समाज से अलग या अकेला महसूस करना या नशे की आदत या बुरी लत
अन्य मानसिक समस्याएं जैसे चिंता या खाने-पीने की समस्याएं
उपचार और थेरेपी

एंटीडिप्रेसेन्टः डिप्रेशन और कभी कभी एसएडी के गंभीर मामलों में इलाज के लिए एंटीडिप्रेसेन्ट दवाएं दी जाती हैं। सर्दियों में अगर लक्षण शुरू होने से पहले ये दवाएं शुरू कर दी जाएं तो परिणाम बेहतर हो सकते हैं। इन्हें बसंत का मौसम शुरू होने तक जारी रखना चाहिए।

लाईट थेरेपीः 1980 के दशक से ही लाईट थेरेपी को एसएडी के लिए अच्छा इलाज माना जाता है। धूप की कमी के कारण होने वाली इस समस्या को दूर करने के लिए मरीज़ को कृत्रिम रोशनी दी जाती है। सुबह के समय लाईट बाॅक्स के सामने बैठने से मरीज़ को लक्षणों में आराम मिलता है।

साइकोथेरेपीः सीबीटी या काॅग्निटिव बिहेवियर थेरेपी साइकोथेरेपी का एक प्रकार है जो एसएडी के इलाज में बेहद फायदेमंद है। पारम्परिक सीबीटी का इस्तेमाल एसएडी के लिए किया जाता है। इसमें व्यक्ति के नकारात्मक सोच या विचारों को पहचाना जाता है और बिहेवियर एक्टिवेशन नामक तकनीक से उसमें सकारात्मक सोच को प्रोत्साहित किया जाता है।

विटामिन डीः आमतौर पर सर्दियों के महीनों में प्राकृतिक रोशनी की कमी सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर का कारण बन सकती है। धूप शरीर में विटामिन डी बनाने के लिए भी ज़रूरी है। प्राकृतिक रोशनी से शरीर में सेरेटोनिन का स्तर बढ़ता है। यह मूड को नियमित करने वाला एक रसायन है।

रोकथाम
सीज़नल यानि मौसम के अनुसार होने वाला डिप्रेशन आसानी से कम किया जा सकता है। लक्षणों की शुरूआत में ही लाईट थेरेपी शुरू करना, घर में रोशनी बढ़ाना, मनन, तनाव प्रबंधन, घर के बाहर ज़्यादा समय बिताना, ज़्यादा समय तक धूप में रहना आदि अच्छे तरीके हैं, जिनसे आप एसएडी से बच सकते हैं।

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