Tuesday, May 21, 2019
Home > स्वास्थ्य > किडनी डिस्फंक्शन पूर्वी भारत में सबसे आम- एसआरएल के विश्लेषण में यह तथ्य सामने आया

किडनी डिस्फंक्शन पूर्वी भारत में सबसे आम- एसआरएल के विश्लेषण में यह तथ्य सामने आया

संवाददाता (दिल्ली) देश के अन्य राज्यों की तुलना में भारत के पूर्वी राज्यों में रहने वाले लोगों में गुर्दों संबंधी जांचों के परिणाम ज़्यादा असामान्य पाए गए हैं, एसआरएल डायग्नाॅस्टिक्स द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया। ये परिणाम 2016 से 2018 के बीच देश भर में ज़्यादातर डाॅक्टरों की पसंदीदा डायग्नाॅस्टिक चेन के द्वारा किए गए किडनी फंक्शन टेस्ट के परिणामों पर आधारित हैं।
ये परिणाम देश भर में किए गए ब्लड यूरिया नाइट्रोजन क्रिएटिनाईन और यूरिक एसिड स्तर की जांच के विश्लेषण से सामने आए हैं। ब्लड यूरिया नाइट्रोजन लिवर के द्वारा प्रोटीन की प्रोसेसिंग के दौरान बनने वाला एक व्यर्थ उत्पाद है जिसे किडनी यानि गुर्दों के द्वारा शरीर से बाहर निकाला जाता है। इसी तरह क्रिएटिनाईन शरीर में पेशियों के सामान्य ब्रेकडाउन से बनने वाला एक उत्पाद है। अगर किडनी अपना काम ठीक से न करें तो खून में इन संकेतकों का स्तर बढ़ने लगता है। इसी तरह हाल ही में हुए एक अनुसंधान से पता चला है कि सीरम यूरिक एसिड का बढ़ना भी रीनल फंक्शन की कमी को बताता है, इन संकेतकों के बढ़ने का अर्थ है कि व्यक्ति डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन का शिकार हो सकता है और उसमें क्रोनिक किडनी रोग की संभावना बढ़ जाती है।
एसआरएल के सर्वेक्षण से पता चला है कि किडनी फंक्शन में असामान्यता (क्रिएटिनाईन और यूए दोनों) पूर्वी क्षेत्रों में सबसे ज़्यादा पाई गई (16 फीसदी), जबकि उत्तरी क्षेत्रों में यह 15 फीसदी पाई गई। लिंग वार असामान्यता की बात करें तो किडनी फंक्शन में असामान्यता महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक आम है, जहां 19 फीसदी पुरुष किडनी डिस्फंक्शन का शिकार हैं, वहीं किडनी डिस्फंक्शन से पीड़ित महिलाओं की संख्या 9 फीसदी है। 33 फीसदी पुरूषों तथा 16 फीसदी महिलाओं में क्रिएटिनाईन या यूए (दोनों में से एक) की मात्रा असामान्य पाई गई। सर्वेक्षण के परिणाम विश्व गुर्दा दिनस के मौके पर जारी किए गए।
इन परिणामों पर अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए डाॅ बी.आर. दास, अडवाइज़र एवं मेंटर- आर एण्ड डी एण्ड माॅलीक्यूलर पैथोलोजी, एसआरएल डायग्नाॅस्टिक्स ने कहा, ‘‘आमतौर पर क्रोनिक रोगों की रोकथाम के लिए चलाए जाने वाले स्वास्थ्य प्रोग्रामों में हाइपरटेंशन, डायबिटीज़ मैलिटस और कार्डियोवैस्कुलर रोगों पर ध्यान दिया जाता है। हालांकि वर्तमान में क्रोनिक किडनी रोगें के मामलों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है, जो ज़्यादातर मामलों में अंतिम अवस्था के गुर्दा रोग बन कर परिवार एवं राष्ट्र पर आर्थिक बोझ पैदा करते हैं। ऐसे मरीज़ों और उनके परिवारों को डायलिसिस और गुर्दा प्रत्यारोपण का भारी खर्च उठाना पड़ता है। ऐसे में हमें इन परिणामों को गंभीरता से लेना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि इनकी रोकथाम के लिए जल्द से जल्द उचित कदम उठाए जाएं, इससे पहले कि इसे प्रबंधन करना असंभव होजाए।’’
‘‘गुर्दा रोग वर्तमान में दुनिया भर में मौतों का 11वां सबसे बड़ा कारण हैं। क्रोनिक गुर्दा रोगों के मरीज़ ज़्यादातर गरीब वर्ग या ऐसे परिवारों से ताल्लुक रखते हैं जो गरीबी की रेखा से नीचे हैं। ऐसे में गंभीर महामारी का रूप लेते इस गैर-संचारी रोग पर ध्यान देने की ज़रूरत है। लोगों को इसके विषय में जागरुक बनाना रोकथाम के लिए बेहर कारगर साबित हो सकता है। ऐसा सरकार, गैर-सरकारी संगठनों, अकादमिकज्ञों एवं सामाजिक कल्याण संगठनों की साझेदारी से संभव है।’’ उन्होंने कहा।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *