Tuesday, October 22, 2019
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मानसिक विकृति के लिए दोषी कौन?

शम्भू पंवार

समाज में बढ़ती मानसिक विकृति के लिए सही मायने में दोषी कौन है? समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को इस विषय में गहरा चिंतन करना होगा। नारी को जहां एक शक्ति का रूप माना जाता है। उसी शक्ति को वर्तमान हालात में आए दिन वहशी दरिंदे अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं।
इन दिनों दो वर्ष से 6 वर्ष तक कि मासूम बालिकाओं को ये मानसिक विकृत लोग अपनी हवस का शिकार बना कर उनकी हत्या कर देते है। ऐसे दरिंदों का एक बार भी उस मासूम को देखकर दिल नहीं पसीजता। वे जरा भी नहीं सोचते कि वे आखिर ये क्या करने जा रहे है। मानसिक विकृति के चलते वह सब कुछ भूल जाते है।
इन दिनो मासूम बच्चियों के साथ हो रही दुष्कर्म की घटनाओं से आमजन भयग्रस्त है।अब माता पिता अपनी बच्ची को स्कूल,बाजार या अन्यत्र भेजने से भी कतराने लगे है।बच्चीयों को खेलने या अकेले बाहर छोड़ने से डरने लगे है।कि कही उनकी बच्ची के साथ कुछ अनहोनी न हो जाये।
समाज मे बढ़ती विकृति में माता पिता किस पर विस्वास करे।कौन सही है और कौन इंसान के भेष में जानवर है।
मानसिक विकृति के चलते बच्चों की बचपन की मासूमियत,हंसी और स्वतंत्रता छीन ली है।माता पिता अब बच्चीयों पर बंदिश रखने लगे है।
समाज में ऐसी घृणित मानसिक विकृति क्यों हुई? इतना नैतिक पतन क्यों हो रहा है? इस पर गहन चिंतन करने की आवश्यकता है।हमको भी यह सोचना होगा की कहि हमारी परवरिश में तो कोई कमी नहीं है। आजकल एकल परिवार भी कहीं ना कहीं इसके लिए दोषी है। पूर्व में जब संयुक्त परिवार होते थे तो उसमें बहुत लाभ था। पूरे परिवार की कमान एक मुखिया के हाथ में होती थी। परिवार उस मुखिया के अनुसार उनके नियम के अनुसार अनुशासन में बंधा हुआ होता था। जब से एकल परिवार होने लगे हैं। तभी से परिवार से अनुशासन, नैतिकता जैसे चीजें लुप्त सी हो गई है।
एकल परिवार का मुखिया जीविकोपार्जन में इतना व्यस्त हो गया है कि सुबह घर से निकलता है और रात्रि में घर वापस आता है।वह जब घर से निकलता है तो बच्चों को सोए हुवे छोड़कर जाता है।और रात्रि में आता है तो सोए हुवे मिलते है। इस दौरान वह न तो बच्चों के साथ बैठकर चर्चा कर पाता है और न ही उनके आचार विचार से परिचित हो पाता है और जहां पति-पत्नी दोनों जॉब करने वाले होते हैं। वहां तो बच्चों की स्थिति बड़ी भिन्न होती है। ऐसे हालातों में बच्चों के नैतिक एवं सामाजिक विचारों से भिन्न होना लाजमी है।
समाज में नैतिकता के लिए समाजिकचिन्तको
व समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को आत्म चिंतन करना होगा। मानसिक विकृति समाज के लिए कैंसर जैसे रोग की तरह भयावह रूप धारण करती जा रही है। यदि शीघ्र ही समाज जागृत नहीं हुआ तो इसका इलाज असंभव है। इसके लिए मानसिक विकृत इंसान के परिवारजनों को हिम्मत और साहस के साथ आगे आना होगा और मानसिक विकृति वाले लोगों का विरोध करना होगा,उनका बहिष्कार करना होगा। समाज के प्रबुद्ध जनों को भी आगे आकर समाज में जागृति लानी चाहिए। मानसिक रूप से विकृत लोगों का कोई धर्म, समाज, रिश्ते, नाते,अपना, पराया नहीं होता है। जहां अवसर मिलता है वे दरिंदगी करने से बाज नहीं आते हैं।
समाज के ठेकेदार राजनीति के चलते जुबान तक नहीं खोलते हैं, और न ही राजनीतिज्ञ कुछ बोलते है तो ऐसे में फिर समाज से विकृत सोच के इंसान और विकृति कैसे खत्म होगी? केवल भाषणों से नैतिकता की बात करने से समाज में सुधार नहीं होगा। समाज सुधार के लिए हम केवल कानून और पुलिस के सहारे बैठे रहेंगे तो समाज से विकृति दूर नहीं हो सकती। इसके लिए हमें कानूनी सहयोग करना जरूरी होगा। सर्वोच्च न्यायालय को भी ऐसे घृणित अपराध के लिए समय सीमा तय करके केवल मृत्युदंड ही निर्धारित करने का कानून बनाया जाना चाहिए ताकि उससे कुछ अंकुश लग सके और इंसान के रूप में ऐसे वहसी जानवरों को सजा मिल सके। तभी इस देश एवं समाज के विकास की बात कह सकते हैं और सोच सकते हैं।

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