Thursday, February 20, 2020
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शिक्षा क्षेत्र को निजी प्रतिभागियों के लिए खोलने से सभी स्तरों पर गुणवत्ता सुनिश्चित होगी

नई शिक्षा नीति के नए वर्ष में लागू होने की संभावना के साथ भारत एक नए युग में प्रवेश करेगा और इससे शिक्षा क्षेत्र की उन चुनौतियों का समाधान होगा, जिनका आगामी दशकों में भारत को सामना करना पड़ेगा।
दोनों शिक्षाविद और सरकार वर्तमान शिक्षा प्रणाली का कायाकल्प करना चाहते हैं। मसौदा प्रस्ताव की कमियों के बारे में काफी कुछ कहा गया है, जिसे इस वर्ष के प्रारंभ में एनईपी के चेयर पर्सन डॉ. के. कस्तुरी राजन द्वारा जारी किया गया था।
14 उम्र से कम के 30 करोड़ बच्चे होने से प्रि-स्कूल और किंडरगार्डन से कक्षा 12 के बेहतर शिक्षा प्र’न करना एक बड़ी चुनौती होगी।
नीति आयोग शिक्षा क्षेत्र में निजी खिलाड़ियों को लाने की जोरदार वकालत की है तथा कई अवसरों पर बेहतर शिक्षा प्रदान करने के निजी क्षेत्र की सफलता के वैश्विक उदाहरण के रूप में आस्ट्रेलिया और कनाडा का उद्धरण दिया है।
शिक्षा मैनेजमेंट कंपनी, एम्परसैंड ग्रुप के संस्थापक,  सस्तम केरावाला जैसे मानकों का मानना है कि विशेष रूप से के12 लेवल पर गुणवत्ता चालित शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार को शिक्षा क्षेत्र को निजी उद्यमियों के लिए खोलने की अत्यावश्यक्ता है, इसके अलावा एनईपी ने उल्लेख नहीं किया है कि पढ़ाने एवं प्रशिक्षण के लिए किस तरह की प्रभावी तकनीकी का उपयोग किया जाएगा। इसमें तकनीकी का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के प्रश्नों का निराकरण नहीं किया गया है। तकनीकी सिर्फ आईसीटी इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थापना करने के बारे में नहीं है, बल्कि संपूर्ण आईटी पॉलिसी लागू होनी चाहिए। एनईपी निजी भागीदारी के बारे में भी गहराई में नहीं गया है और गैर-लाभ क्या है और क्या नहीं है, उसको परिभाषित किया है। इसमें निजी खिलाड़ियों के परिणामोन्मुख प्रोत्साहन की बात नहीं है।
श्री केरावाला का मानना है कि शिक्षा को इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा देने से संपूर्ण शिक्षा उद्योग को पुनर्परिभाषित करने में मदद मिलेगी और निजी खिलाड़ियों को इस क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए तैयार मंच मिलेगा।
उन्होंने आगे कहा, इस समय भारत में 15  लाख मान्यताप्राप्त स्कूल है जिसमें से लगभग १२ लाख सरकारचालित  या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल हैं। यदि बाजार को निजी प्रतिभागियों के लिए खोला जाता है तो एक-दूसरे के साथ की स्पर्धा से आटोमेटिक रूप से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होने के साथ पहुंचे बढ़ेगी तथा लागत में कमी आएगी। खुले बाजार में बाजार परिबलों के बीच स्पर्धा से यह भी सुनिश्चित होगा कि कोई भी बाहर नहीं होगा।
हालांकि उनका मानना है कि ऐसी पहल के लिए निजी खिलाड़ियों को पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी के रूप में सहयोग करने की जरूरत है।
केरावाला जिनके देशभर में 38  स्कूल है ने कहा, ‘‘निजी खिलाड़ी को बढ़ती पहुंच, क्वालिटी, सरकारी स्वामित्व और सरकार द्वारा चालित और अर्ली लर्निंग सेन्टरों के मैनेजमेंट में भागीदारी कर सरकारी पहलों को सपोर्ट करने की जरूरत होगी। लक्ष्य हासिल होने पर उन्हें प्रोत्साहन देने के साथ सुधार का मार्ग अपनाने की अनुमति देनी चाहिए।
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्कूलों की स्थापना करने एवं व्यवस्थापन करने का अनुभव एवं ट्रैक रिकार्ड रखनेवाला खिलाड़ियों को बूट (बिल्ड – ओन – ऑपरेट – ट्रांसफर) पार्टनर के रूप में नियुक्त किया जा सकता है।
निजी क्षेत्र के बहुत से लोगों ने आम चिंता व्यक्त की कि शैक्षिक संस्थाओं पर मुनाफा कमाने पर रोक है, जबकि अन्य क्षेत्रों में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। केरावाला ने कहा, इस समय शिक्षा संस्थान स्थापित करने वाले खिलाड़ी उलझन में है क्योंकि शिक्षा संस्थान स्थापित करने वाले व्यक्ति को मुनाफा कमाने की अनुमति नहीं है। हालांकि शिक्षा में निवेश करने वाले को छोड़कर सेवा प्रदान करने वाला हर अन्य व्यक्ति – बिल्डर से चेयर सप्लायर से टेबल सप्लायर, कम्प्यूटर सप्लायर, साफ्टवेयर सप्लायर तक हर व्यक्ति मुनाफा कमाता है। इससे खिलाड़ियों पर कर लगाने के साथ इसके साथ भी नार्मल बिजनेस की तरह बर्ताव करना चाहिए, लेकिन पॉलिसी में इसका समाधान नहीं किया गया है।

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