Friday, December 4, 2020
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देश के वर्तमान परिदृश्य में पत्रकार के सामजिक सुरक्षा और पत्रकारिता के नियामक भविष्य हेतु मीडिया कौंसिल बनाने की मांग

संवाददाता (दिल्ली) वर्तमान परिदृश्य में पत्रकारों की सामाजिक सुरक्षा के संदर्भ में केंद्र एवं राज्य सरकार के उत्तरदायित्व पर  नारद संचार द्वारा एक ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन किया गया, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार और लोकसभा पार्लियामेंट के पूर्व मानद सलाहकार राहुल देव, भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व डीजी केजी सुरेश, दैनिक भास्कर के पूर्व डिप्टी एडिटर एवं रामनाथ गोयनका से सम्मानित संतोष कुमार और द वायर की पत्रकार रीतू तोमर ने हिस्सा लिया |
इस दौरान राहुल देव ने कहा, पत्रकारों की सुरक्षा का विषय बहुत अहम है, पर दुर्भाग्य से हमारे पास कोई सुखद समाचार इस विषय पर नहीं है, आज के पूरे परिदृश्य में चाहे वह राजनीतिक,आर्थिक या स्वास्थ्य से जुड़ा हो,  किसी भी तरह की सुरक्षा पत्रकारों को मिल नहीं रही है, न ही सरकार से और न ही किसी मीडिया संस्था से
इस विषय को आगे बढ़ाते हुए केजी सुरेश ने कहा, इंडिया टीवी से मेरे जानने वाले मित्र ने एक इनसाइडर मैसेज भेजा, जिसमें लिखा था कि हम अपने पत्रकारों के वेतन में कुछ कटौती करेंगे या आज की परिस्थिति के हिसाब से गुणवत्ता पत्रकारिता के लिए कुछ संस्करणों को बंद करना होगा जिसके चलते हम संस्था में कुछ पत्रकारों की संख्या कम करेंगे. उम्मीद है कि आप हमारा कहना समझ पाएंगे। मेरा यह मानना है की आज के समय में पत्रकारों को न्यूनतम वेतन से भी कम दिया जाता है, हिंदुस्तान टाइम्स से 150 कर्मचारियों को बाहर कर दाय गया. इस समय में वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट और वेज बोर्ड फॉर जर्नलिस्ट्स एंड रिपोर्टर्स जैसे संगठन चौथे स्तंभ की सुरक्षा हेतु कुछ कर क्यों नहीं रहे?
फेक न्यूज के चलते पत्रकारिता का स्तर घटने के सवाल पर केजी सुरेश जी ने कहा, कुछ चीजों को डीलैजिटिमाइज करना जरूरी हो गया है. एक अफवाह को न्यूज का दर्जा देना गलत है. अगर वो फेक है तो वो न्यूज नहीं हो सकती और अगर वो न्यूज है तो वो फेक नहीं हो सकती। न्यूज एक प्रोसेस्ड प्रोडक्ट है। किसी जानकारी को क्रॉस चेक, वेरिफाई और मीडिया एथिक्स को ध्यान में रखकर उसे लिखना न्यूज कहलाता है।
इस देश में मीडिया साक्षरता कार्यक्रमों का परिचय कराना बहुत आवश्यक हो गया है। यह सिर्फ मीडिया छात्रों के लिए नहीं बल्कि देश के हर तबके में बड़े पैमाने पर मीडिया साक्षरता प्रोग्राम्स करने की जरूरत है और मै उम्मीद करता हूं कि नारद संचार जैसी संस्थाएं इसमें पहल करेंगी
मुझे लगता है सरकारों से ज्यादा उत्तरदायित्व मीडिया संस्थान का बनता है अगर वह ईमानदारी से पत्रकारिता करे तो निश्चित तौर से चीजें अपने आप बदल जाएंगी, हमे बहुत ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ेगा। आज के संदर्भ में हम देखे तो अभी भी जातिवाद, चमचावाद, अपनावाद इस तरह की चीज़े बहुत मजबूती से पत्रकारिता में जड़ जमाए हुए है।
बता दें कि इस ऑनलाइन परिचर्चा को सोशल मीडिया के द्वारा विभिन्न राज्यों मे रह रहे लोगो से जोड़कर उनकी राय और प्रतिक्रिया भी ली गई।

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