Wednesday, September 30, 2020
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29 वर्षीय मरीज का हार्ट ट्रांसप्लान्ट सफलतापूर्वक पूरा किया गया

अंतिम चरण के हार्ट फेलियर से ग्रस्त 29 वर्षीय मरीज का मैक्स अस्पताल, साकेत में सफलता पूर्वक हार्ट ट्रांसप्लान्ट किया गया। दुर्भाग्य से दिल के ट्रांसप्लान्ट के तुरंत बाद मरीज की किडनी खराब हो गई। अस्पताल की मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम द्वारा समय पर इलाज करने से मरीज को एक नया जीवन प्राप्त हुआ।

मरीज राज कुमार रावत को अस्पताल में चौथे चरण की डिस्पेंसिया (सांस की समस्या) और 15% हार्ट फंक्शन के साथ भर्ती किया गया था। इस स्थिति को गंभीर एलवी डिस्फंक्शन के नाम से भी जाना जाता है।

इस दौरान, अस्पताल में मरीज की हालत की गहन जांच की गई। सीने के एक्स-रे की मदद से दिल के बढ़े हुए आकार और प्लूरल कैविटी में द्रव संचय की पहचान हुई।

2012 की शुरुआत में जब मरीज 21 वर्ष का था, तो उसके दिल की मांसपेशियां असामान्य रूप से मोटी हो गई थीं जिसके कारण दिल रक्त को ठीक से पंप नहीं कर पा रहा था। ऐसे में उसके दिल की सर्जरी की गई थी। इसके बाद 2015 में उसके दिल के 2 चैम्बरों में पेसमेकर इंप्लान्ट किया गया।

नई दिल्ली में साकेत स्थित मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में हार्ट ट्रांसप्लान्ट और वेंट्रिकुलर असिस्ट डिवाइसेस के निदेशक, प्रमुख सलाहकार व कार्डियक सर्जन, डॉक्टर केवल कृष्ण ने बाताया कि, “चूंकि मरीज के 2 हृदय वाल्व ठीक से काम नहीं कर रहे थे इसलिए रक्त प्रवाह पीछे की तरफ होने लगा था, जो ऑक्सीजनेटेड रक्त और डी-ऑक्सीजनेटेड रक्त के मिश्रण का कारण बना। इको से उसकी वेंट्रिकल की गति में कमी का खुलासा हुआ जिसके कारण पंपिंग की प्रक्रिया में दबाव पड़ रहा था। मरीज की बिगड़ती हालत और इतिहास को देखते हुए उसे तुरंत ऑर्थोटॉपिक कार्डियक ट्रांसप्लान्ट की सलाह दी गई। समय को बर्बाद किए बिना उसके दिल को डोनर के दिल के साथ बदल दिया गया। इसके बाद मरीज की सही हालत को देखते हुए उसके शरीर में डाली गई ट्यूब को अगले दिन ही डिस्चार्ज कर दिया गया।”

हालांकि, ट्रांस्पान्ट के बाद मरीज पूरी तरह सामान्य था लेकिन दिल सामान्य रूप से नहीं धड़क रहा था। इससे थक्कों की समस्या के साथ हार्ट फेलियर की समस्या भी हो सकती है। ऐसे में उसे एंटी-एरिथमिया मेडिकेशन दिया गया।

सर्जरी के बाद की जांचों से पता चला कि मरीज में हल्के आरवी डिस्फंक्शन की समस्या थी। जब टीम ने ओलिगुरिया का निरीक्षण किया तो मरीज में फिर से ट्यूब डालनी पड़ी।

डॉक्टर कृष्ण ने आगे बताया कि, “हालांकि, मरीज के शरीर में एसिड की मात्रा बहुत ज्यादा थी, उसकी किडनी ने ठीक से काम करना बंद कर दिया था जिसके कारण रीनल रिप्लेसमेंट थेरेपी करना आवश्यक हो गया था। 3 दिनों बाद मरीज की पेशाब में सुधार आया और उसकी अंतिम डायलिसिस को पूरा किया गया। इसी के साथ उसके दिल और किडनी दोनों में सुधार आया जिसके बाद मरीज में डाली गई ट्यूब को निकाल दिया गया। इसके बाद मरीज ने धीरे-धीरे सामान्य आहार लेना शुरू कर दिया।”

अंत में उसे वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया, पेसिंग की तारें हटा दी गईं और इको की रिपोर्ट भी सही आई। इसके बाद मरीज ने तेजी से रिकवर करना शुरू कर दिया और कुछ दिनों में उसे डिस्चार्ज भी कर दिया गया। फिलहाल मरीज को समय-समय पर जांच कराने की सालह दी गई है।

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