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सरकार आपकी

लाल बिहारी लाल अब कैसे गलेगी दाल सरकार आपकी जनता का हाल बेहाल सरकार आपकी अब कैसे गलेगी दाल...... अच्छे दिनों का वादा करके सता में आये थे बेरोजगारी महँगाई पर जनता को भाये थे चार साल में जनता को कर दिया कंगाल अब कैसे गलेगी दाल...... खत्म किया सब्सिडी सब, दाम बढ़ाया रोज जनता करे त्राहि-त्राहि,मुश्किल हो गया

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प्रणव दा का समकालीन पाठ

विश्वजीत राहा (स्वतंत्र टिप्पणीकार) पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय जाना और संघ के शिक्षा वर्ग को संबोधित करने पर जितना राजनीतिक भूचाल पहले था, कमोबेश वही भूचाल संबोधन के बाद भी है। भारतीय जनता पार्टी व विपक्षी पार्टियां इस संबोधन की व्याख्या अपने

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कविता – जवाब देना होगा

 नीरज त्यागी                                                          एक अजीब सी ख्वाईश थी कभी। बुलंदियों का आसमान छूने की ।। आज भी आसमान छूने की ख्वाईश है । पर अब आसमान

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तेजी से बढ़ रही मिड कैप कंपनियों का स्थान है भारत

आशुतोष बिश्नोई (प्रबंध निदेशक, महिंद्रा म्युचुअल फंड)                               भारत पिछले कुछ सालों से वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था वाले देशों में से एक है और पिछले 8 सालों में इसकी अर्थव्यवस्था एक ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर

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कविता – नीर हुआ गंभीर

सबके अपने दर्द है सबके अपने नीर । क्यों तू अपने दर्द पर नीर हुआ गभीर ।। मतलबी के दिल मे कब था तेरा दर्द । जिससे उसका काम बने बस उसी के लिए उसके नीर ।। नाटक ऐसे कर रहा जैसे हर लेगा सारे पीर । समय जरूरत का पड़े तो निकल गए उसके

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शीर्षक “नेता” पर साहित्यकारों एवं कवियों के शानदार दोहे

1 राजनीति में पक रही ,सबकी काली दाल । नेता सारे चल रहे , टेढ़ी अपनी चाल ।। संजय कुमार गिरि 2- नेता देखो मांगते,नेताओं से भीख। एक दूसरे में लगे,देने को ये सीख।। नवीन कुमार भट्ट 3- कलयुग में भगवान का, नेता है अवतार। मीठी-मीठी बात से,लाल का हो शिकार।। लाल बिहारी लाल 4-- राजनीति से चल बसा,नैतिकता का नाम। नेता वो ही

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कविता – मर गया स्वाभिमान

नीरज त्यागी  आईने के इधर भी मैं,उधर भी मैं । फिर अपने आप पर अभिमान क्यों नही है ।। जो दिख रहा है वो लगता तो मेरे जैसा है । पर उसमें दिखता स्वाभिमान क्यों नही है ।। क्यों एक सवाल सा उसकी आँखों मे है । जिसका जवाब मेरे पास क्यों नही है ।। लगता है

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कविता – गुनाह

नीरज त्यागी कुछ इस कदर अपने गुनाहों का हिसाब रखता हूँ, एक आईना पीछे और एक आईना सामने रखता हूँ, सभी गुनाहों मैं कुछ गुनाह मेरे छूट ना जाये, इसलिए आईने अपने दाये- बाये भी रखता हूँ, वो जो ऊपर बैठा है गिनता रहे मेरे सारे गुनाह, इसलिए सर के ऊपर खुला आसमान रखता हूँ, ना वो

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शीर्षक ” माँ ” पर कुछ कवि एवं साहित्यकारों के रचनात्मक विचार

1- माँ के क़दमों में है जन्नत ये बताने वाले मुझको लगता है कि जन्नत से वो आगे न गए दीक्षित दनकौरी 2- जीवन के हर मोड़ पर, छले गए हर बार। मां की ममता साथ थी,हार गया संसार।। सरिता गुप्ता दिल्ली 3- माँ जीवन का सार है, माँ है तो संसार। माँ बिन जीवन लाल का,समझो है बेकार।। लाल बिहारी लाल 4-- रहे

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मजदूरों के हितों की रक्षा जरुरी है – लाल बिहारीलाल

जब इस धरती का निर्माणहुआ तो इसमें पहले मजदूर के रुप में त्रिदेवों –ब्रम्हा, विष्णु एवं महेश ने कामकिया। फिर अलग अलग रुप से काम को श्रेणियों में बांट दिया गया। निर्माण का कामब्रम्हा जी,कार्यपालिका का काम विष्णु जीऔर फिर न्यायपालिका का काम भगवान महादेव को बनाया गया। इन सब

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